पीपलू, राजस्थान

टोंक जिला
ऐतिहासिक विरासत एवं गाथा

पीपलू की ऐतिहासिक धरोहर एवं विरासत

सदियों पुरानी गौरवशाली परंपरा, स्वयंभू शिवलिंग की खोज, विक्रमी संवत 697 का प्राचीन चारभुजा नाथ मंदिर, अंतःबंधन स्थापत्य कला और शौर्य की अमर गाथा।

भाग १ • प्रारंभिक गाथा

उद्गम, स्वयंभू शिवलिंग एवं गाँव की स्थापना

ढूंढाड़ के धोली गांव के एक गुर्जर का भैंसा हर थोड़े दिनों में कहीं चला जाता था और कुछ समय पश्चात पुनः लौट आता था। ऐसा कई दिनों तक चलता रहा। गुर्जर को अपने भैंसे की चिंता भी होने लगी। उसने ध्यान दिया कि जब भी उसका भैंसा वापस आता, तो उसके गोबर का रंग बदल गया होता था। उसे देखकर लगता था कि वह किसी उपजाऊ जमीन पर चरकर आता है।

गुर्जर ने उसका पीछा करने का निर्णय लिया और वह उसका पीछा करते-करते एक ऐसे स्थान पर पहुंच गया जहाँ चारों ओर अत्यधिक हरियाली थी। जानवरों के चरने के लिए घने पेड़-पौधे एवं घास थी और मध्य में एक विशालकाय तालाब था। उस तालाब के किनारे एक स्वयंभू शिवलिंग स्थापित था। उसने शिवलिंग को देखकर श्रद्धा से शीश नवाया और प्रणाम किया।

उस समय धोली गांव और आसपास के संपूर्ण क्षेत्र में सूखा व शुष्क वातावरण था, अतः यह सब देखकर वह गुर्जर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। वह वहाँ से अपने भैंसे को लेकर वापस अपने गांव लौट आया और नगर सेठ पितासाह महाजन (बीजाबरगी) को इस हरियाली भूमि के बारे में बताते हुए उस रमणीक स्थान का घणो चोखो वर्णन किया।

पीपलू के प्रथम पाँच संस्थापक नागरिक (पंच गोत्र)

पितासाह बीजाबरगी ने अपने परिवार एवं चार अन्य जातियों के प्रमुखों के साथ इस नए स्थान पर बसने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। इस तरह पाँच गोत्र के व्यक्तियों ने पीपलू के प्रथम नागरिकों के रूप में यहाँ स्थायी निवास प्रारंभ किया।

स्वयंभू शिवलिंग
तालाब के किनारे स्थापित स्वयंभू शिवलिंग, जिसने इस क्षेत्र में सभ्यता का बीज बोया।

बीजाबरगी महाजन

नगर सेठ पितासाह

कोली गुर्जर

चंदेल खटीक

बक्तेड़ा बैरवा

कड़वा नायक

नामकरण का आधार

इस प्राचीन क्षेत्र में पीपल के वृक्षों की अत्यधिक बहुतायत होने के कारण, संभवतः इस नए नगर को कालांतर में "पीपलू" नाम से जाना जाने लगा।

भाग २ • शिल्प व इतिहास

१५ मंदिरों का प्रण, संवत ६९७ का शिलालेख एवं स्थापत्य

पितासाह ने गांव में पंद्रह तिथियों के अनुसार १५ भव्य मंदिरों के निर्माण का प्रण लिया था। उनमें से कुछ मंदिरों का निर्माण वे अपने जीवन काल में पूर्ण करवा पाए, जबकि शेष मंदिरों का निर्माण उनके वंशजों द्वारा संपन्न कराया गया।

पितासाह द्वारा निर्मित मंदिरों में प्रमुख हैं — चारभुजा नाथ जी का भव्य मंदिर, तालाब के किनारे स्थित श्री सीताराम जी का मंदिर एवं श्री लक्ष्मण जी का मंदिर।

चारभुजा नाथ मंदिर अपनी अनुपम स्थापत्य कला और प्राचीनता के लिए पूरे क्षेत्र में विख्यात है। मंदिर में लगे ऐतिहासिक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण ६९७ विक्रम संवत में हुआ था। शिलालेख पर सेठ पितासाह महाजन बीजाबरगी, उनकी धर्मपत्नी नाथीबाई एवं उनके सुपुत्र गोपाल का नाम अंकित है।

चारभुजा नाथ मंदिर का प्राचीन शिलालेख
चारभुजा मंदिर का शिलालेख (विक्रम संवत ६९७) — उत्तरगुप्त लिपि में उत्कीर्ण।
भगवान नारायण की मूल चतुर्भुज प्रतिमा
श्वेत पाषाण में भगवान नारायण के चतुर्भुज रूप की अलौकिक छवि।
उत्तरगुप्त लिपि एवं अंतःबंधन (इंटरलॉकिंग) तकनीक

यह शिलालेख उत्तरगुप्त साम्राज्य में प्रयोग होने वाली प्राचीन लिपि में लिखा हुआ है, जिसे देवनागरी लिपि की पूर्वज भी कहा जा सकता है। यह लिपि ५वीं से १०वीं शताब्दी के मध्य प्रचलन में थी, जो मंदिर निर्माण काल की अकाट्य पुष्टि करती है। सबसे विशेष बात यह है कि इस मंदिर के निर्माण में चूने-गारे का प्रयोग नहीं हुआ है, बल्कि पत्थर से पत्थर को जोड़कर अंतःबंधन (Interlocking) तकनीक से यह भव्य संरचना खड़ी की गई है। यह मंदिर इस क्षेत्र की स्थापत्य कला का जीता जागता उदाहरण है।

भाग ३ • देव परिसर

तीन गर्भगृह, बारीक नक्काशी एवं १०८ सोपान

लोक कथाओं के अनुसार, सेठ पितासाह परिसर में मुख्यतः पाँच मंदिरों का निर्माण करवाना चाहते थे, परंतु यहाँ तीन दिव्य मंदिरों का निर्माण पूर्ण हो पाया।

इन तीन मंदिरों के मुख्य गर्भगृह में श्रीनारायण चारभुजा के स्वरूप में हैं। गर्भगृह के दायीं ओर राधा नागर तथा बायीं ओर भगवान शंकर की मूर्ति विराजित की गई है।

चारभुजा राधा नागर मंदिर
चारभुजा मंदिर परिसर में दायीं ओर स्थित राधा नागर मंदिर।
चारभुजा शिव मंदिर
गर्भगृह की बायीं ओर स्थित भगवान शंकर की प्राचीन शिवलिंग पीठ।

गुंबद, खंभों एवं छत पर उत्कृष्ट महीन नक्काशी

इस मंदिर की दीवारों, गुंबद, खंभों और छत पर कलाकारों द्वारा अत्यंत उत्कृष्ट एवं बारीक नक्काशी उकेरी गई है। सनातनी परंपरा और वैदिक प्रतीकों को पत्थरों पर सजीव कर दिया गया है।

गुंबद की नक्काशी
गुंबद की नक्काशी — पत्थरों पर शिल्पकला की सजीव अभिव्यक्ति।
दीवारों की पौराणिक कलाकृतियाँ
दीवारों पर पौराणिक देव कलाकृतियाँ एवं सूक्ष्म रूपांकन।
पत्थरों की शिल्प डिज़ाइन
शिल्प अभिकल्पना

मंदिरों के पृष्ठ भाग में स्थित विशेष मूर्तियाँ

राधा नागर मंदिर के पीछे की ओर बनी चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति, मुख्य मंदिर के पीछे बनी दूसरी चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति एवं शिव मंदिर के पीछे स्थापित नरसिंह अवतार की मूर्ति विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। इन मूर्तियों के निर्माण में शास्त्रीय सनातनी शिल्प परंपरा का पूर्ण ध्यान रखा गया था।

राधा नागर के पीछे विष्णु प्रतिमा
राधा नागर मंदिर के पीछे: चतुर्भुज स्वरूप में भगवान विष्णु।
मुख्य मंदिर के पीछे विष्णु प्रतिमा
मुख्य मंदिर के पीछे: द्वितीय चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा।
शिव मंदिर के पीछे नरसिंह अवतार
शिव मंदिर के पीछे: भगवान नरसिंह अवतार की पाषाण मूर्ति।
१०८ सोपानों (सीढ़ियों) का भव्य स्थापत्य

एक समय श्री चारभुजा नाथ मंदिर में १०८ सीढ़ियाँ (सोपान) थीं, जो लक्ष्मण मंदिर के निकट तक जाती थीं। इस मंदिर की एक दुर्लभ विशेषता यह थी कि आप सीढ़ियों के अंतिम छोर पर खड़े होकर भी श्री चारभुजा नाथ के सीधे दर्शन कर सकते थे। कालांतर में नगर निर्माण एवं लोगों द्वारा मंदिर के अनादर के कारण ये सीढ़ियाँ धीरे-धीरे दबती चली गईं।

भाग ४ • सेवा व समर्पण

श्री सीताराम जी मंदिर, पुष्कर के पंडे एवं ३६५ बीघा भूमि

श्री सीताराम जी मंदिर में स्थापित मूर्ति एक दुर्लभ 'चल मूर्ति' है। मान्यता है कि इस मूर्ति का स्वरूप प्रभु श्री राम के वनवास काल से प्रेरित होकर गढ़ा गया है।

श्री सीताराम जी मंदिर मूर्ति
श्री सीताराम जी मंदिर।

मंदिर का निर्माण प्रारंभ हो चुका था, परंतु गांव में कोई ब्राह्मण न होने से यह प्रश्न उठा कि मंदिर की नित्य सेवा-पूजा कौन करेगा? इसलिए मंदिर की शास्त्रीय सेवा करने हेतु पुष्कर तीर्थ से पराशर पंडों को सेठ पितासाह द्वारा आदरपूर्वक लाया गया।

३६५ बीघा कृषि भूमि का दान — नित्य एक बीघा का भोग

मंदिर के साथ ३६५ बीघा उपजाऊ जमीन जोड़ी गई, ताकि चारभुजा नाथ जी का प्रतिदिन (वर्ष के ३६५ दिन) एक बीघा की उपज से भोग लग सके। इस व्यवस्था से पंडित भी पूर्ण भक्ति, एकाग्रता एवं निष्ठा से मंदिर की सेवा कर सकें और मंदिर को भविष्य में कभी किसी साधन की कमी न हो।

भाग ५ • सामाजिक इतिहास

विजयवर्गीय "चौधरी" गोत्र की ऐतिहासिक उत्पत्ति

पितासाह ने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। उनके मन में विचार आया कि इतने भव्य मंदिर के अनुसार ही ब्रह्म भोज में पधारे ब्राह्मणों को यथोचित दक्षिणा दी जानी चाहिए।

पितासाह ब्राह्मणों को सोने का टुकड़ा दान में देना चाहते थे। उन्हें विदित था कि ब्राह्मण ऐसा भारी स्वर्ण दान सीधे स्वीकार नहीं करेंगे। इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों को विदाई के समय खिलाए जाने वाले पान के बीड़े में एक तोला सोने का टुकड़ा रखकर आदर सहित खिलाया।

ब्राह्मणों को जब यह बात ज्ञात हुई, तो वे पहले क्षुब्ध हुए और दान वापस लौटाना चाहा क्योंकि उन्हें यह अनुचित लगा। तब एक वृद्ध पंडित ने कहा — "सेठ जी की दी हुई दक्षिणा लौटाना धर्म सम्मत नहीं होगा। इसके बदले हमें सेठ जी को ऐसा सम्मान देना चाहिए जो युगों-युगों तक अमिट छाप छोड़ जाए।"

सुरठेठ से "चौधरी" की उपाधि

समस्त विप्र समाज ने मिलकर पितासाह के समक्ष कहा — "आपने नारायण के सम्मुख हमें यह दान दिया है, अतः हम भी आपको आशीर्वाद स्वरूप सम्मान देते हैं।" उस दिन ब्राह्मण समाज ने मिलकर पितासाह के गोत्र को "सुरठेठ" से बदलकर "चौधरी" कर दिया। इस प्रकार पीपलू, विजयवर्गीय समाज के "चौधरी" गोत्र का ऐतिहासिक उद्गम स्थल बना।

भाग ६ • संघर्ष व शौर्य

औरंगजेब का हमला, मूर्तियों की रक्षा एवं बलिदान

मुगल बादशाह औरंगजेब का आतंक जब ढूंढाड़ क्षेत्र में फैल रहा था, तब पीपलू के प्रबुद्ध जनों को यह आशंका हुई कि उसकी सेना चारभुजा नाथ मंदिर पर भी हमला कर सकती है।

इसी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए गांव के पाँच पटेलों ने मुख्य मूर्ति को चारभुजा मंदिर से गुप्त रूप से हटाकर टोंक के चतुर्भुज तालाब में सुरक्षित छुपा दिया। गांव के निवासियों ने मुख्य मूर्ति को तो सुरक्षित कर लिया, परंतु आक्रांताओं ने मंदिर के चारों ओर स्थित सुंदर मूर्तियों को खंडित कर दिया। मंदिर की रक्षा करते हुए अनेक ग्रामीणों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

आक्रमण के प्रत्यक्ष साक्ष्य — खंडित पाषाण प्रतिमाएँ

आज भी मंदिर की बाहरी दीवारों पर भगवान नरसिंह, नारायण के चतुर्भुज स्वरूप व अन्य पाषाण मूर्तियों को खंडित रूप में देखा जा सकता है। किसी मूर्ति का मुख, किसी का हाथ और किसी का अंग खंडित किया गया।

खंडित पाषाण मूर्ति १
खंडित प्रतिमा साक्ष्य १
खंडित पाषाण मूर्ति २
खंडित प्रतिमा साक्ष्य २
खंडित पाषाण मूर्ति ३
खंडित प्रतिमा साक्ष्य ३
खंडित पाषाण मूर्ति ४
खंडित प्रतिमा साक्ष्य ४

आतंक समाप्त होने के पश्चात जब ग्रामीण टोंक के चतुर्भुज तालाब पर मूर्ति को लेने पहुंचे, तो वहाँ के निवासियों को वह मूर्ति पहले ही मिल चुकी थी और उन्होंने उसे वहीं स्थापित कर दिया था, जिसे आज टोंक में चतुर्भुज मंदिर के नाम से जाना जाता है।

स्थापित मूर्ति को वापस लाना संभव नहीं था। इसका कोई अनुमान नहीं है की मूर्ति गाड़ने वाली पीढ़ी और मूर्ति वापस लेने जाने वाली पीढ़ी में कितना समय का अंतर था। उस काल में क्षेत्र में डिग्गी कल्याण जी का प्रभाव अत्यधिक बढ़ चुका था। अतः चारभुजा नाथ मंदिर में नई मूर्ति को श्री कल्याण जी महाराज के पावन स्वरूप में विधिवत स्थापित किया गया, जो आज भी गर्भगृह में दर्शन दे रही है।

श्री चारभुजा नाथ जी (डिग्गी कल्याण जी स्वरूप)
वर्तमान में मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थापित श्री चारभुजा नाथ जी (डिग्गी कल्याण जी स्वरूप) की प्रतिमा।

इस प्रकार चारभुजा नाथ मंदिर के मुख्य गर्भगृह में भगवान विष्णु के चतुर्भुज स्वरूप से डिग्गी कल्याण जी स्वरूप की स्थापना की यह ऐतिहासिक कथा है।

मुख्य द्वार पर गरुड़ प्रतिमा
पितासाह के वंशजों द्वारा मंदिर के मुख्य द्वार के ऊपर स्थापित गरुड़ प्रतिमा।
भाग ७ • वर्तमान व भविष्य

आधुनिक काल, विवाद एवं संरक्षण की पुकार

स्वतंत्रता के पश्चात भी कई वर्षों तक विजयवर्गीय चौधरी परिवार चारभुजा नाथ मंदिर का मुख्य व्यवस्थापक रहा। उन्हीं के परिवार के बुजुर्गों की देखभाल में चारभुजा नाथ मंदिर की खेती, यहाँ की पूजा पद्धति और भोग व्यवस्था सब कुछ सुचारू रूप से संचालित हो रही थी।

१९८७ का वाक-विवाद एवं व्यवस्था परिवर्तन

१९८७ में एक कथित साधु एवं विजयवर्गीय परिवार के सदस्य के बीच में एक वाक-विवाद शुरू हुआ। इसी बात ने बहुत बड़ा आकार ले लिया। इस विवाद के चलते विजयवर्गीय परिवार से मंदिर व्यवस्था का अधिकार लेकर गांव वालों ने इस मंदिर को संपूर्ण गांव के मंदिर के रूप में माना।

२१वीं सदी में मंदिर को आधुनिक क्षति एवं उपेक्षा

२१वीं सदी में श्री चारभुजा नाथ मंदिर पर औरंगजेब के आक्रमण के समक्ष ही मंदिर को भारी हानि पहुँचाई गई। मंदिर की मूल वास्तुकला को छुपा दिया गया। मंदिर की छत पर जिस पर उत्कृष्ट नक्काशी बनी हुई थी, जिसे शायद वर्तमान समय में बनाने में करोड़ों का व्यय हो, उसे सीमेंट से भरकर नष्ट कर दिया गया। मंदिर में कई जगह और भी सीमेंट लगाकर वहाँ के मूल स्वरूप को नष्ट किया गया या फिर नष्ट करने का प्रयास किया गया।

मंदिर में जब चाहा ईंटों की दीवार खड़ी कर दी और जब चाहा उसे तोड़ दिया। मंदिर के इतिहास, विरासत और इस भव्य शिल्पकला का बार-बार अनादर किया गया। जिन लोगों ने यह किया उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि सीमेंट इस भव्य शिल्पकला को हमेशा के लिए नष्ट कर देगी। इन व्यक्तियों में ऐसी किसी भी शिल्पकला का निर्माण करने का सामर्थ्य नहीं है, परंतु इन व्यक्तियों ने पितासाह के उत्कृष्ट निर्माण को अपनी निजी संपत्ति मानकर औरंगजेब के आक्रमणकारियों की तरह नुकसान पहुँचाया और गाँव का मृत समाज, जो १९८७ में इस मंदिर का व्यवस्थापक बना था, देखता रहा।

आधुनिक सीमेंट क्षति १
मनमाने निर्माण एवं ईंटों की दीवारों से मंदिर के मूल स्वरूप का आच्छादन।
आधुनिक सीमेंट क्षति २
प्राचीन पाषाण नक्काशी पर आधुनिक सीमेंट का लेप — मूल शिल्प को क्षति।
संरक्षण का संकल्प

पीपलू का यह प्राचीन चारभुजा नाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राजस्थान के ढूंढाड़ क्षेत्र की अद्वितीय पाषाण स्थापत्य कला, सामाजिक सौहार्द और इतिहास का जीवंत साक्ष्य है। इस ऐतिहासिक धरोहर का वैज्ञानिक पद्धति से संरक्षण करना और इसे अपनी भावी पीढ़ियों के लिए सहेजना हम सभी का कर्तव्य है।

चारभुजा नाथ मंदिर परिसर का मानचित्र
चारभुजा नाथ मंदिर परिसर का मानचित्र एवं विन्यास (ब्लूप्रिंट)